Saturday, March 15, 2014

आज का श्लोक, ’स्थाणुः’/ 'sthANuH'

आज का श्लोक, ’स्थाणुः’/ 'sthANuH'
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’स्थाणुः’/ 'sthANuH' - सदा / स्थिर रहने वाला / अविनाशी और अविकारी ।

अध्याय  2, श्लोक 24,

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
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(अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम् अक्लेद्यः अशोष्य एव च ।
नित्यम् सर्वगतम् स्थाणुः अचलः अयम् सनातनः ॥)
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भावार्थ :
यह (आत्मा) अच्छेद्य है, - अर्थात् इसे काटा या विभाजित नहीं किया जा सकता, अदाह्य है, - अर्थात् इसे जलाया नहीं जा सकता, अक्लेद्य है, - अर्थात् जल में भीग या घुल नहीं सकता, और अशोष्य है, -अर्थात् इसे सुखाया / सोखा भी नहीं जा सकता ।  नित्य है, सर्वव्यापी है, अचल और सनातन (अनादि और अन्तरहित) है ।
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’स्थाणुः’/ 'sthANuH' - unchangeable,

Chapter 2, shloka 24,

acchhedyo'yamadAhyo'yaM-
akledyo'shoShya eva cha |
nityaH sarvagataH sthANuH 
achalaH ayaM sanAtanaH ||
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Meaning :
This (Reality / Self) is indivisible, can not be cut or broken into pieces, can be neither burned nor dried, Everlasting, all-pervading, unchangeable, eternally the same is This.
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