Monday, March 17, 2014

आज का श्लोक, ’स्तब्धः’ / 'stabdhaH'

आज का श्लोक,  ’स्तब्धः’ / 'stabdhaH'
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’स्तब्धः’ / 'stabdhaH'

अध्याय 18, श्लोक 28,

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥
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(अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठः नैष्कृतिकः अलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामसः उच्यते ॥)
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कर्तृत्व (की वह भावना) जिससे तादात्म्य रखनेवाला मनुष्य अयुक्त (योगरहित / अनुपयुक्त), शिक्षा और संस्कार से रहित, घमण्डी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करनेवाला, शोकग्रस्त, आलस्ययुक्त, और अपने कार्य को समय पर न करते हुए किसी न किसी बहाने से टालते रहनेवाला होता है ।
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’स्तब्धः’ / 'stabdhaH' - obstinate,

Chapter 18, shloka 28,
ayuktaH prAkRtaH stabdhaH
shaTho naiShkRtiko'lasaH |
viShAdI dIrGasUtrI cha
kartA tAmasa uchyate ||
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Meaning :
The one with a sense of doer-ship tainted with the strains of Callousness, foolishness and arrogance, deceitfulness, wickedness, laziness, melancholy, and procrastination is called a tAmasa kartA.
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