Wednesday, March 5, 2014

आज का श्लोक, ’स्निग्धाः'/ 'snigdhAH'

आज का श्लोक,  ’स्निग्धाः'/ 'snigdhAH
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’स्निग्धाः'/ 'snigdhAH' - तेल, घी, मक्खन, आदि स्निग्ध पदार्थ-युक्त ।
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अध्याय 17, श्लोक 8. --
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आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाःस्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥
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(आयुःसत्त्व-बल-आरोग्य-सुख-प्रीति-विवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिराः हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥)
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भावार्थ :
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख एवं प्रीति इन सबका संवर्धन करनेवाले तथा रस्य - रसयुक्त (रूखे नहीं)  स्निग्ध -स्नेहयुक्त, स्थिर - शरीर में अधिक समय तक साररूप से रहनेवाले (पोषक) और हृद्य अर्थात् हृदय को प्रिय ऐसे पदार्थ सात्त्विक स्वाभाव वाले मनुष्य को भाते हैं।
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’स्निग्धाः'/ 'snigdhAH' - containing oils / butter (fats).
Chapter 17, shlok 8.
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AyuH-sattva-balArogya-
sukha-prItirvivardhanAH |
rasyAH snigdhAH sthirA hRdyA
AhArAH sAttvika-priyAH ||
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Meaning :
Food that ensures longevity, virtue, vigor, vitality, good health, joy and happiness, which appeals to the taste, contains oils / ghee / butter in moderate quantity, loved by heart, and easily digestible, are liked by those with sattvika  tendencies.
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