Tuesday, March 11, 2014

आज का श्लोक, ’स्थितधीः’ / 'sthitadhIH'

आज का श्लोक ’स्थितधीः’ / 'sthitadhIH'
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’स्थितधीः’ / 'sthitadhIH' -  स्थितप्रज्ञ, - जिसकी बुद्धि आत्मा में ठहर चुकी होती है,
अध्याय 2, श्लोक 54,
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अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥
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(स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किम्-आसीत व्रजेत किम् ॥)
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भावार्थ :
अर्जुन ने कहा :
हे केशव! जिस मनुष्य की बुद्धि आत्मा में ठहर चुकी होती है, ऐसे समाधिस्थ की भाषा कैसी होती है? स्थितधी क्या कहता-बोलता है, कैसे उठता-बैठता, लोगों से और अपने जीवन में कैसे व्यवहार करता है?
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अध्याय 2, श्लोक 56,
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दुःखेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
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(दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्प्हः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीः मुनिः उच्यते ॥)
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दुःख जिसके मन को उद्विग्न नहीं करते और सुख जिसके मन में (सुख की) लालसाएँ उत्पन्न नहीं करते, जो राग अर्थात् लिप्तता से, भय और क्रोध से ऊपर उठ चुका है, ऐसे मनुष्य को स्थितधी मुनि कहा जाता है ।
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’स्थितधीः’ / 'sthitadhIH' - One of steady, unwavering mind,
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Chapter 2, shloka 54,
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arjuna uvAcha -
sthitaprajnasya kA bhAShA
samAdhisthasya keshava |
sthitadhIH kiM prabhASheta
kimAsIta vrajeta kiM ||
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Meaning :
arjuna said :
Keshava (shrikRShNa) ! How a 'sthitaprajna', - the One whose mind has acquired the understanding of the Reality, and deviates not from the same, speaks, talks, moves about and behaves in general? What signs are there that indicate such a man ?
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Chapter 2, shloka 56,
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duHkheShvanudvignaH
sukheShu vigataspRhaH |
vIta-rAga-bhaya-krodhaH
sthitadhIrmuniruchyate ||
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Meaning :
One who is not perturbed by the miseries, one who craves not for the pleasures, when in happiness, who is free from attachment, fear and anger, is called a sahe of steady mind.  
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