Sunday, March 30, 2014

आज का श्लोक, ’सुखेषु’ / 'sukheShu'

आज का श्लोक, ’सुखेषु’ / 'sukheShu'
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’सुखेषु’ / 'sukheShu'

अध्याय 2, श्लोक 56,
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दुःखेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
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(दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्प्हः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीः मुनिः उच्यते ॥)
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दुःख जिसके मन को उद्विग्न नहीं करते और सुख जिसके मन में (सुख की) लालसाएँ उत्पन्न नहीं करते, जो राग अर्थात् लिप्तता से, भय और क्रोध से ऊपर उठ चुका है, ऐसे मनुष्य को स्थितधी मुनि कहा जाता है ।
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’सुखेषु’ / 'sukheShu'

 Chapter 2, shloka 56,
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duHkheShvanudvignaH
sukheShu vigataspRhaH |
vIta-rAga-bhaya-krodhaH
sthitadhIrmuniruchyate ||
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Meaning :
One who is not perturbed by the miseries, one who craves not for the pleasures when in happiness, who is free from attachment, fear and anger, is called a sage of steady mind.
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