Tuesday, March 11, 2014

आज का श्लोक, - ’स्थित्वा’ / 'sthitvA'

आज का श्लोक  - ’स्थित्वा’ / 'sthitvA'
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’स्थित्वा’ / 'sthitvA' - सुस्थिर, अधिष्ठित होकर,
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अध्याय 2, श्लोक 72,
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एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥
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(एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ न एनाम् प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वा अस्याम् अन्तकाले अपि ब्रह्मनिर्वाणम् ऋच्छति ॥)
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भावार्थ :
हे पार्थ (हे अर्जुन!) यह वह ब्राह्म-अवस्था है, जिसे पाकर मनुष्य फिर कभी मोहित-बुद्धि नहीं होता । और इसमें स्थित हुआ वह अन्तकाल में भी ब्रह्मरूपी निर्वाणपद को प्राप्त हो जाता है ।
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’स्थित्वा’ / 'sthitvA' - having well-settled in the state,
Chapter 2, shloka 72,
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eShA brAhmI sthitiH pArtha
nainAM prApya vimuhyati |
sthitvAsyAmantakAle'pi
brahmanirvANamRchchhati |
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Meaning :
O partha (arjuna) this state of revelation (of the Supreme) is the Reality Ultimate, when attained, one is not bewildered any more. Abiding in It, even at the moment of death while leaving this body, one enters the Brahman only.
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