Friday, March 28, 2014

आज का श्लोक, ’सुदुर्दर्शम्’ / 'sudurdarshaM'

आज का श्लोक, ’सुदुर्दर्शम्’ / 'sudurdarshaM'
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’सुदुर्दर्शम्’ / 'sudurdarshaM' -  शोभनीय दर्शन, जो अत्यन्त दुर्लभ हो ।

अध्याय 11, श्लोक 52,

श्री भगवानुवाच -
सुदुर्दर्शनमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥
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(सुदुर्दर्शनम् इदम् रूपम् दृष्टवान् असि यन्मम ।
देवाः अपि अस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥
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भगवान् श्रीकृष्ण बोले -
मेरे जिस रूप का दर्शन तुमने किया, यह अत्यन्त दुर्लभ है । देवता भी मेरे उस रूप के दर्शन की आकाङ्क्षा सदैव किया करते हैं ।
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’सुदुर्दर्शम्’ / 'sudurdarshaM' - Such a form, hardly visible, and only to a rare-one.

Chapter 11, shloka 52,
Lord kRShNa said :
sudurdarshamidaM rUpaM
dRShTavAnasi yanmama |
devA apyasya rUpasya
nitya darshanakAMkShiNaH ||
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Meaning : This My form, that I revealed before you, is visible only to a fortunate  rare fortunate one. Even the gods ever long for having a glance of this.
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