Monday, March 17, 2014

आज का श्लोक, ’स्तब्धाः’ / 'stabdhAH'

आज का श्लोक,  ’स्तब्धाः’ / 'stabdhAH'
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’स्तब्धाः’ / 'stabdhAH'

अध्याय 16, श्लोक 17,
आत्मसंभाविता स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥
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(आत्मसंभाविताः स्तब्धाः धनमानसमन्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैः ते दम्भेन अविधिपूर्वकम् ॥)
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वे अपने आप को ही श्रेष्ठ माननेवाले, घमण्डी मनुष्य धन तथा मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधि से रहित यजन  अर्थात् यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं ।
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’स्तब्धाः’ / 'stabdhAH' - Filled with vanity,

Chapter 16, shloka 17,
AtmasambhAvitAH stabdhA 
dhanamAnasamanvitA |
yajante nAmayajnaiste
dambhenAvidhipUrvakaM ||
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Full of Self-esteem and self-pride, arrogant and full of vanity, cruelty and show of wealth, such people perform sacrifice (yajna) without following the proper scriptural injunctions .
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