Tuesday, March 25, 2014

आज का श्लोक, ’सुहृत्’ / 'suhRt'

आज का श्लोक ’सुहृत्’ / 'suhRt'
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’सुहृत्’ / 'suhRt' - आत्मीय, आराध्य,

अध्याय 9, श्लोक 18,
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गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥
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(गतिः भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणम् सुहृत्
प्रभवः प्रलयः स्थानम् निधानम् बीजम् अव्ययम् ॥)
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भावार्थ :
सभी का परम गंतव्य, पालनहारा, स्वामी, सबमें साक्षी की तरह विद्यमान, सबका वास्तव्य, शरण, और सुहृद्, सबके उद्भव तथा लय का हेतु, सब का आधार, निधान, (जिसे त्यागा न जा सके) और  कारण, अव्यय ।
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’सुहृत्’ / 'suhRt' - the Beloved Supreme,

Chapter 9, shloka 18,

gatirbhartA prabhuH sAkShI
nivAsaH sharaNaM suhRt |
prabhavaH pralayaH sthAnaM
nidhAnaM bIjamavyayaM ||

Meaning :
(I AM) the destination, the sustain-er, the Lord, the witness, the abode, the shelter, the very heart / the Friend and Beloved, I am the origin, evolution and the dissolution, The Ultimate, the imperishable seed and the only refuge.
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