Wednesday, July 30, 2014

आज का श्लोक, ’शास्त्रविधिम्’ / ’śāstravidhim’

आज का श्लोक,
’शास्त्रविधिम्’ / ’śāstravidhim’
__________________________

’शास्त्रविधिम्’ / ’śāstravidhim’ - शास्त्र में कही गई विधि,

अध्याय 16, श्लोक 23,

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
--
(यः शास्त्रविधिम्-उत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न सः सिद्धिम्-अवाप्नोति न सुखम् न पराम् गतिम् ॥)
--
भावार्थ :
जो मनुष्य शास्त्रसम्मत (वेदविहित) तरीके को त्यागकर अपनी इच्छा से प्रेरित हुआ मनमाना आचरण करता है उसे ध्येय-प्राप्ति नहीं होती, उसे न ही सुख प्राप्त होता है और न परम गति ।
--

अध्याय 17, श्लोक 1,

अर्जुन उवाच :
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥
--
(ये शास्त्रविधिम् उत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषाम् निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वम् आहो रजः तमः ॥)
--
भावार्थ :
अर्जुन ने प्रश्न किया -
जो लोग शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट विधि का, (उनसे अनभिज्ञ होने से, या परिस्थितियों के कारण) निर्वाह नहीं कर पाते, किन्तु श्रद्धा से युक्त होते हैं, उनकी निष्ठा को हे कृष्ण! सात्त्विक, राजसिक अथवा तामसिक में से किस श्रेणी में रखा जा सकता है?
--
टिप्पणी :
कुछ लोगों की परम सत्ता में श्रद्धा तो होती है, किन्तु स्पष्टता न होने से उसकी उपासना कैसे करें इस बारे में उन्हें ठीक से निश्चय नहीं होता । दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो ऐसी किसी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार तक नहीं करते, किन्तु वे भी अपने आप के एक चेतन-सत्ता होने के सहजतः प्रकट तथ्य को न तो अस्वीकार कर सकते हैं न असिद्ध कर सकते हैं । ऐसे लोगों की गति उनकी प्रकृति के अनुसार तय होती है । किन्तु जो लोग किसी ऐसी परम सत्ता पर सम्यक् चिन्तन से प्राप्त निश्चयपूर्वक या अन्तःप्रज्ञा से ही श्रद्धा रखते हैं और उन्हें लगता है कि वे उस परम सत्ता को ठीक से नहीं जानते, इसलिए उसको जानने या प्राप्त करने के लिए उसकी येन केन प्रकारेण उपासना करते हैं, वे भी अपनी प्रकृति के अनुसार उसकी कृपा के भागी होते हैं । आनेवाले श्लोक 2 में यही स्पष्ट किया गया है कि यह यह श्रद्धा भी पुनः प्रकृति के ही तीन गुणों के अनुसार सात्त्विक, राजसिक अथवा तामसिक होती है । इन तीन गुणों या प्रकृतियों वाले मनुष्यों की उपासना विधि भी तीन प्रकार की होती है । किन्तु जो पूरी तरह अपनी प्रकृति से ही परिचालित होते हैं, जिन्हें न तो परम सत्ता और न ही अपने-आपके बारे में जानने समझने की कोई रुचि होती है, वे किसी इष्ट की उपासना क्यों करेंगे?
--
’शास्त्रविधिम्’ / ’śāstravidhim’ - the due procedure as laid down in the scriptures (śāstra),

Chapter 16, śloka 23,

yaḥ śāstravidhimutsṛjya
vartate kāmakārataḥ |
na sa siddhimavāpnoti
na sukhaṃ na parāṃ gatim ||
--
(yaḥ śāstravidhim-utsṛjya
vartate kāmakārataḥ |
na saḥ siddhim-avāpnoti
na sukham na parām gatim ||)
--
Meaning :
One who ignores scriptural injunctions and acts motivated by desire, does not attain perfection, nor happiness and the goal of the supreme spiritual goal.
--

Chapter 17, śloka 1,

arjuna uvāca :
ye śāstravidhimutsṛjya
yajante śraddhayānvitāḥ |
teṣāṃ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa
sattvamāho rajastamaḥ ||
--
(ye śāstravidhim utsṛjya
yajante śraddhayānvitāḥ |
teṣām niṣṭhā tu kā kṛṣṇa
sattvam āho rajaḥ tamaḥ ||)
--
Meaning :
arjuna :
What kind of the conviction ( niṣṭhā) is of those, who are devoted ( śraddhayānvitāḥ) to the Supreme principle (that maintains this whole existence), but don't quite follow the specific injunctions as are laid down in the scriptures (just because of the circumstances).
--

No comments:

Post a Comment