Saturday, July 26, 2014

आज का श्लोक, ’शृणोति’ / ’śṛṇoti’

आज का श्लोक, ’शृणोति’ / ’śṛṇoti’
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’शृणोति’ / ’śṛṇoti’ - सुनता है,

अध्याय 2, श्लोक 29,

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥
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(आश्चर्वत्-पश्यति कश्चित्-एनम्
आश्चर्वत्-वदति तथा एव च अन्यः ।
आश्चर्यवत् च एनम् अन्यः शृणोति 
श्रुत्वा अपि एनम् वेद न च एव कश्चित् ॥)
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भावार्थ :
(अध्याय 2 के श्लोक 11 से इसकी भूमिका बनी और क्रमशः इसका उपोद्घात और संवर्धन करते हुए प्रस्तुत करते हुए अर्जुन का ध्यान श्लोक 13, 14, 15 के माध्यम से पहले ’देही’ तथा ’धीर’ पर फिर श्लोक 16 में दृष्टा पर, जिसकी अविनाशिता और देहों की नश्वरता को श्लोक 16, 17, 18 में स्पष्ट किया गया और बाद के श्लोकों में कुछ विस्तारपूर्वक किन्तु सारगर्भित रूप में इसका वर्णन किया गया जिस अद्भुत् ’अविनाशी’ तत्व के बारे में भगवान् श्रीकृष्ण प्रस्तुत श्लोक में कहते हैं,...)
इसे कोई तो आश्चर्य से देखता है, इसी तरह से कोई अन्य इसका वर्णन करते हुए आश्चर्य से अभिभूत होता है, और इस वर्णन को सुननेवालों में से कोई इसे उतने ही आश्चर्य के साथ सुनता है, तथापि सुनकर भी कोई इसे जान नहीं पाता ।
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’शृणोति’ / ’śṛṇoti’ -  hears to, 

Chapter 2, śloka 29,

āścaryavatpaśyati kaścidena-
māścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ |
āścaryavaccainamanyaḥ śṛṇoti
śrutvāpyenaṃ veda na caiva kaścit ||
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(āścarvat-paśyati kaścit-enam
āścarvat-vadati tathā eva ca anyaḥ |
āścaryavat ca enam anyaḥ śṛṇoti 
śrutvā api enam veda na ca eva kaścit ||)
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Meaning : 
Some (a few those, who have come across this) see This with great awe, few others speak of This with great wonder, few hear to the same in utter wonderment and though many hear about This, no one ever knows This.     
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Note :
( śloka 11, of this chapter 2 was the starting point that served as the introduction for bringing arjuna's attention to this core-principle. And the same was gradually unfolded, developed and elucidated beautifully through the śloka-s 13 to 29. The principle that is variously termed as ’īśvara’, ’ātman’ ’brahman’, according to those, who knew / realized this principle which defies kind of any description. Beginning with 'the physical body', then of the consciousness associated with the physical body, the attention is brought to the one witness that is even beyond the consciousness, because consciousness is ever in a flux. The witness though is the bridge where-from attention take a jump into Beyond and 'BE' 'THAT', or simply realize the fact that THAT BEYOND is the core-principle which has bean dealt with in many great scriptures, and one has never been other than THAT.)   

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