Thursday, July 24, 2014

आज का श्लोक, ’श्रद्दधानाः’ / ’śraddadhānāḥ’

आज का श्लोक,
’श्रद्दधानाः’ / ’śraddadhānāḥ’
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’श्रद्दधानाः’ / ’śraddadhānāḥ’ - श्रद्धा से पूर्ण,

अध्याय 12, श्लोक 20,

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥
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(ये तु धर्म्यामृतम् यथा-उक्तम् पर्युपासते ।
श्रद्दधानाः मत्परमाः भक्ताः ते अतीव मे प्रियाः ॥)
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भावार्थ :
जैसा यहाँ इस ग्रन्थ में वर्णन किया गया, मेरे प्रति श्रद्धायुक्त मेरे परायण जो भक्त इस आचरणीय धर्ममय अमृत का भली-भाँति भक्तिपूर्वक सेवन करते हैं वे तो मुझे अतिशय प्रिय हैं ।

टिप्पणी :
    इस अध्याय के श्लोक 12 में बतलाया गया है कि (अभ्यास की आवश्यकता के महत्व के) ज्ञान के बिना किए जानेवाले अभ्यास से अभ्यासरहित ज्ञान श्रेष्ठ है (क्योंकि वह ज्ञानसहित अभ्यास के लिए प्रेरित कर सकता है ) इसी प्रकार ऐसे (वैचारिक, बौद्धिक) ज्ञान की अपेक्षा ध्यान (तत्व-चिन्तन या इष्ट के स्वरूप का चिन्तन) और भी अधिक श्रेष्ठ है (क्योंकि तब अन्त में यह स्पष्ट हो जाता है कि इष्ट का स्वरूप वही चैतन्य-तत्व है जो कि अपनी आत्मा ही है, और इस प्रकार इष्ट से अपनी अनन्या-भक्ति फलित हो जाती है), किन्तु तब भी साँसारिक इच्छाओं के आकर्षण में कर्म से प्राप्त होनेवाले फलों की प्राप्ति की आशा से निवृत्ति हो जाए यह आवश्यक नहीं, और ऐसी आशा बनी रहने तक परम शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? यह जान लेने के बाद कि फलत्याग सर्वाधिक श्रेष्ठ है और मनुष्य इस सहज-स्थिति को और सुस्थिर शान्ति भीप्राप्त कर लेता है, ऐसी शान्ति जिसे प्राप्त हो जाती है उसमें पाए जानेवाले लक्षणों का वर्णन श्लोक 13 से 19 तक तथा अन्त में इस श्लोक 20 में किया गया है ।)
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’श्रद्दधानाः’ / ’śraddadhānāḥ’ - Those who have sincere and earnest trust.

Chapter 12, śloka 20,

ye tu dharmyāmṛtamidaṃ
yathoktaṃ paryupāsate |
śraddadhānā matparamā
bhaktāste:'tīva me priyāḥ ||
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(ye tu dharmyāmṛtam
yathā-uktam paryupāsate |
śraddadhānāḥ matparamāḥ
bhaktāḥ te atīva me priyāḥ ||)
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Meaning :
My devotees, those who with sincere and earnest trust in Me, follow this ambrosial-teaching full of 'dharma' (which is dharmya, one should try to practice always), with dedicated  mind and heart, with due regard to this teaching, are the most beloved to Me.
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Note :
Comparing the sense of 'dharmya' in this śloka 20, with its use in śloka 33 of this chapter 2, may help in grasping the meaning in a better way.
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