Monday, July 21, 2014

आज का श्लोक, ’श्रुतिविप्रतिपन्ना’ / ’śrutivipratipannā’

आज का श्लोक,
’श्रुतिविप्रतिपन्ना’ / ’śrutivipratipannā’
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’श्रुतिविप्रतिपन्ना’ / ’śrutivipratipannā’ -  भिन्न-भिन्न मतों को सुनकर अनिश्चयग्रस्त और संशयग्रस्त हुई (तुम्हारी बुद्धि),

अध्याय  2, श्लोक 53,
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श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
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(श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधौ-अचला बुद्धिः तदा योगम् अवाप्स्यसि ॥)
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भावार्थ :
विविध प्रकार के परस्पर भिन्न भिन्न मतों को सुनने से विचलित और भ्रमित हुई तुम्हारी बुद्धि निश्चल होकर जब अचलरूप से समाधि में सुस्थिर हो जाएगी, तब तुम्हें  योग की उपलब्धि हो जाएगी ।
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’श्रुतिविप्रतिपन्ना’ / ’śrutivipratipannā’ - (The intellect) caught into conflict and confusion because of having heard so many different opinions.

Chapter 2, śloka 53,
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śrutivipratipannā te
yadā sthāsyati niścalā |
samādhāvacalā buddhis-
tadā yogamavāpsyasi ||
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(śrutivipratipannā te
yadā sthāsyati niścalā |
samādhau-acalā buddhiḥ
tadā yogam avāpsyasi ||)
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Meaning :
When your mind becomes free from the many intellects of the varied and confusing kinds, and stays silent in the Self, then in that silence of the mind, you attain the yoga.
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