Monday, July 21, 2014

आज का श्लोक, ’श्रुतस्य’ / ’śrutasya’

आज का श्लोक,
’श्रुतस्य’ / ’śrutasya’
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’श्रुतस्य’ / ’śrutasya’ - सुने हुए का,

अध्याय 2, श्लोक 52,

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥
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(यदा ते मोहकलिलम् बुद्धिः व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदम् श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥
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भावार्थ : जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर लेगी, अर्थात् उसमें नहीं फँसेगी, तब तुम्हें निर्वेद  (वैराग्य) की वह स्थिति प्राप्त होगी जिसमें श्रवण किए हुए ज्ञान के वास्तविक अभिप्राय, और सुनकर अपनी बुद्धि से ग्रहण किए गए उसके अवास्तविक अभिप्राय का अन्तर मिट जाएगा, अर्थात् जो कहा गया उसे तुम्हारी बुद्धि यथावत् ग्रहणकरेगी और वैराग्य में स्थिर हो जाएगी ।
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’श्रुतस्य’ / ’śrutasya’ - of the one that has been heard,

Chapter 2, śloka 52,

yadā te mohakalilaṃ
buddhirvyatitariṣyati |
tadā gantāsi nirvedaṃ
śrotavyasya śrutasya ca ||
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(yadā te mohakalilam
buddhiḥ vyatitariṣyati |
tadā gantāsi nirvedam
śrotavyasya śrutasya ca ||
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Meaning :
When your intellect will be pure enough so as to cross over the quagmire of delusion, where you are presently stuck, where the difference between the true content of the teachings of the scriptures that you have heard, and the meaning that you should have heard, (and not interpreted by your intellect), cease to exist.
When this difference between the both ceases completely, you shall attain the state of detachment (nirveda) .
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