Thursday, July 31, 2014

आज का श्लोक, ’शाश्वत-धर्मगोप्ता’ / ’śāśvata-dharmagoptā’

आज का श्लोक,
’शाश्वतधर्मगोप्ता’ / ’śāśvatadharmagoptā’
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’शाश्वत-धर्मगोप्ता’ / ’śāśvata-dharmagoptā’ - धर्म की नित्य रक्षा करनेवाले,

अध्याय 11, श्लोक 18,

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वत-धर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥
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(त्वम् अक्षरम् परमम् वेदितव्यम्
त्वम् अस्य विश्वस्य परम् निधानम्
त्वम् अव्ययः शाश्वत-धर्मगोप्ता
सनातनः त्वम् पुरुषः मतः मे ॥)
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भावार्थ :
आप ही एकमेव जानने योग्य परम अक्षर (अविनाशी) तत्त्व हैं, आप ही इस संपूर्ण विश्व के अधिष्ठान / आश्रय हैं, आप ही अनश्वर धर्म के नित्य रक्षा करनेवाले हैं, और आप ही  सदा रहनेवाले नित्य परम् पुरुष हैं ऐसा मेरा मत है ।
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’शाश्वत-धर्मगोप्ता’ / ’śāśvata-dharmagoptā’ - The Lord who protects 'dharma' always, during all times.

Chapter 11, śloka 18,
tvamakṣaraṃ paramaṃ veditavyaṃ
tvamasya viśvasya paraṃ nidhānam |
tvamavyayaḥ śāśvata-dharmagoptā 
sanātanastvaṃ puruṣo mato me ||
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(tvam akṣaram paramam veditavyam
tvam asya viśvasya param nidhānam
tvam avyayaḥ śāśvata-dharmagoptā
sanātanaḥ tvam puruṣaḥ mataḥ me ||)
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Meaning :
You are alone the One Imperishable, The Supreme, ever worth-knowing, You are the only support of the whole world, You alone protect and save the virtue-eternal (śāśvata-dharma) for ever, It is my firm conviction that You are alone -The Self (ātman), and prevail at all times,
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