Wednesday, July 23, 2014

आज का श्लोक, ’श्रीमत्’ / ’śrīmat’

आज का श्लोक, ’श्रीमत्’ / ’śrīmat’
___________________________

’श्रीमत्’ / ’śrīmat’ - विशेषता युक्त, ऐश्वर्य से पूर्ण,

अध्याय 10, श्लोक 41,

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥
--
(यत् यत् विभूतिमत् सत्त्वम् श्रीमत् ऊर्जितम् एव वा।
तत् तत् एव अवगच्छ त्वम् मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥)
--

भावार्थ :
जो जो भी विशेषता युक्त, ऐश्वर्य से पूर्ण, और प्राणवान तत्त्व दिखलाई देता है, उस सभी को तुम मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न हुआ जानो ।
--

’श्रीमत्’ / ’śrīmat’ - glorius, resplendent,

Chapter 10, śloka 41,

yadyadvibhūtimatsattvaṃ
śrīmadūrjitameva vā|
tattadevāvagaccha tvaṃ
mama tejoṃ:'śasambhavam ||
--
(yat yat vibhūtimat sattvam
śrīmat ūrjitam eva vā|
tat tat eva avagaccha tvam
mama tejaḥ aṃśa sambhavam  ||)
--

Meaning :
Know well, whatever is glorious, resplendent, or powerful, that everything is born of a part of My own Splendor.
--

No comments:

Post a Comment