Tuesday, July 29, 2014

आज का श्लोक, ’शिष्यः’ / ’śiṣyaḥ’

आज का श्लोक, ’शिष्यः’ / ’śiṣyaḥ’
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’शिष्यः’ / ’śiṣyaḥ’ - शिष्य, छात्र,

अध्याय 2, श्लोक 7,
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कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥७
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(कार्पण्य-दोष-उपहत-स्वभावः
पृच्छामि त्वाम् धर्मसम्मूढचेताः ।
यत्-श्रेयः स्यात्-निश्चितम् ब्रूहि तत्-मे
शिष्यः ते-अहम् शाधि माम् त्वाम् प्रपन्नम् ॥)
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भावार्थ :
भावनात्मक दुर्बलता की प्रवृत्ति से अभिभूत हुआ मैं, मेरा धर्म क्या है इस बारे में संशयग्रस्त हो रहा हूँ । इसलिए आपसे पूछता हूँ कि मेरे लिए जो भी निश्चित ही श्रेयस्कर है उसे मुझसे कहें । मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण हूँ, मुझे शिक्षा दें ।
टिप्पणी :
व्युत्पत्ति :
’छात्र’ - जो किसी की छत्रछाया में होता है, ’शिष्य’ - जो किसी के शासन (शास् > शिक्षा देना) में होता है ।
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’शिष्यः’ / ’śiṣyaḥ’ - disciple, student,

Chapter 2, śloka 7,

kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ
pṛcchāmi tvāṃ dharmasammūḍhacetāḥ |
yacchreyaḥ syānniścitaṃ brūhi tanme
śiṣyaste:'haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam ||7
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(kārpaṇya-doṣa-upahata-svabhāvaḥ
pṛcchāmi tvām dharmasammūḍhacetāḥ |
yat-śreyaḥ syāt-niścitam brūhi tat-me
śiṣyaḥ te-aham śādhi mām tvām prapannam ||)
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Meaning :
Overcome by pity and faintheartedness, puzzled in the heart about what is the right path of 'dharma' for me, I am asking for your guidance, Please instruct and teach me, I am your disciple, seeking refuge in you.
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