Thursday, August 28, 2014

आज का श्लोक, ’विधीयते’ / ’vidhīyate’

आज का श्लोक,
’विधीयते’ / ’vidhīyate’  
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’विधीयते’ / ’vidhīyate’ - प्रयुक्त की जाती है, प्रयुक्त की जा सकती है,

अध्याय 2, श्लोक 44,

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते
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(भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम् तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥)
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भावार्थ :
जिनकी बुद्धि भोग और ऐश्वर्य से अत्यन्त लुब्ध और आसक्त है, और इसलिए उनकी ही प्राप्ति के लिए लालायित है, इस प्रकार के लोगों की परमात्मा में कदापि रुचि नहीं होती, और उनकी ध्येयपरक बुद्धि उस परमार्थ तत्व में संलग्न भी नहीं हो पाती ।  
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’विधीयते’ / ’vidhīyate’ - to be engaged in, could be taken help of as an instrument / tool, 
 
Chapter 2, śloka 44,

bhogaiśvaryaprasaktānāṃ 
tayāpahṛtacetasām |
vyavasāyātmikā buddhiḥ 
samādhau na vidhīyate ||
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(bhogaiśvaryaprasaktānām 
tayāpahṛtacetasām |
vyavasāyātmikā buddhiḥ 
samādhau na vidhīyate ||)
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Meaning :
Those whose minds are attracted towards the enjoyments of wealth and pleasures of the world, and so have a deep attachment towards them, their intellect of determination never tends to be drawn towards the ultimate destiny (paramārtha tatva) of consciousness. 
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