Wednesday, August 13, 2014

आज का श्लोक, ’विशिष्यते’ / ’viśiṣyate’

आज का श्लोक,
’विशिष्यते’ / ’viśiṣyate’
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’विशिष्यते’ / ’viśiṣyate’ - अधिक श्रेष्ठ होता है,

अध्याय 3, श्लोक 7,

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मएन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते
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(यः तु इन्द्रियाणि मनसा नियम्य आरभते अर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः सः विशिष्यते ॥)
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भावार्थ :
भावार्थ :
किन्तु जो मनुष्य मन से इन्द्रियों को वश में रखते हुए समस्त कर्मेन्द्रियों के द्वारा अनासक्ति सहित कर्मयोग का आचरण करता है, वह (पूर्वोक्त श्लोक में वर्णित मनुष्य की अपेक्षा) श्रेष्ठ है ।
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अध्याय 5, श्लोक 2,

श्रीभगवानुवाच :

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते
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(सन्न्यासः कर्मयोगः च निःश्रेयस्करौ उभौ ।
तयोः तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगः विशिष्यते ॥)
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भावार्थ :
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा :
संन्यास और कर्मयोग दोनों ही निश्चय ही समान रूप से परम कल्याणकारी हैं, किन्तु कर्मसंन्यास की तुलना में कर्मयोग (कुछ भिन्न होने से उससे अपेक्षाकृत) अधिक श्रेष्ठ है ।
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टिप्पणी :
यहाँ पहले यह जान लेना रोचक होगा कि कर्मसंन्यास तथा कर्मयोग में क्या समानता और क्या भेद है । कर्मसंन्यास से यहाँ तात्पर्य है सांसारिक कर्मों से स्वेच्छया  अपने-आपको मुक्त रखते हुए साँख्ययोग का अभ्यास करना । इसके लिए मनुष्य को परिवार और समाज के संबंधों को त्यागना आवश्यक अनुभव हो सकता है । परन्तु चूँकि उन संबंधों की कोई वास्तविक सत्ता नहीं होती वरन् वे स्मृति और प्रमादवश ही सत्य की भाँति ग्रहण कर लिए जाते हैं, और उनकी यह आभासी तथा औपचारिक सत्ता भी स्मृति पर ही अवलंबित होती है, इसलिए स्मृति की सत्यता पर सन्देह न होने तक ऐसा अभ्यास, यह ’कर्मसंन्यास’ अभ्यासमात्र है, एक सीमा तक इसकी अपनी उपयोगिता भी है ही । किन्तु ’कर्मयोग’ इस अर्थ में इस ’कर्मसंन्यास’ से भिन्न है, कि इसमें मनुष्य कर्मों के होने या न होने से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि कर्म प्रकृति के तीन गुणों का कार्य है, और अपने करने या न करने के आग्रह या विचार से उनके होने या न होने का कोई संबंध नहीं है । और तब वह अपने कर्ता होने की भावना से भी मुक्त रहते हुए शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों के कर्म में संलग्न या असंलग्न रहते हुए भी अपने स्वाभाविक ’अकर्ता’ और बोधमात्र होने की सत्यता को जानने लगता है । यद्यपि वह इसे परिभाषित भी न कर सके, किन्तु इससे उसके मन में जो शान्ति व्याप्त होती है, उसे वही जानता और अनुभव करता है । और इसलिए इस दृष्टि से कर्मयोग को कर्मसंन्यास से कुछ अधिक श्रेष्ठ कहा जा सकता है । किन्तु फल (परिणाम) की दृष्टि से दोनों समान ही हैं । अगले श्लोक (6) में इसी तथ्य की पुष्टि देखी जा सकती है । 
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अध्याय 6, श्लोक 9, 

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते
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(सुहृत्-मित्र-अरि-उदासीन-मध्यस्थ-द्वेष्य-बन्धुषु ।
साधुषु अपि च पापेषु समबुद्धिः विशिष्यते ॥)
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भावार्थ :
*सुहृत् - प्रत्युपकार न चाहते हुए उपकार करनेवाला,
मित्र - स्नेह रखनेवाला,
अरि - शत्रु,
उदासीन - पक्षपातरहित,
मध्यस्थ - जो परस्पर विरोध रखनेवालों दोनों पक्षों का हितैषी हो,
द्वेष्य - अपना अप्रिय,
बन्धुः - संबंधी,
साधु अर्थात् शास्त्र के अनुसार श्रेष्ठ आचरणकरनेवाले,
एवं निषिद्ध कर्म करनेवाले, इन सबमें जो समबुद्धिवाला है, अर्थात्
कौन कैसा है इस बारे में निर्णय नहीं देता, ऐसा योगी योगारूढ पुरुषों में
उत्तम है ।
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अध्याय 7, श्लोक 17,

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥
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(तेषम् ज्ञानी नित्ययुक्तः एकभक्तिः विशिष्यते
प्रियः हि ज्ञानिनः अत्यर्थम् अहम् सः च मम प्रियः ॥
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भावार्थ :
(मुझे भजनेवाले चार प्रकार के उपरोक्त श्लोक (16) में वर्णित भक्तों में से,) 
मुझमें एकनिष्ठ भक्ति रखनेवाला मुझमें नित्य निमग्न ज्ञानी भक्त श्रेष्ठ है, क्योंकि जैसा वह मुझे प्रिय है, मैं भी उसे स्वरूपतः वैसा ही प्रिय हूँ । 
अगले श्लोक (18) में इसे और स्पष्ट किया गया है ।
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अध्याय 12, श्लोक 12,

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥
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(श्रेयः हि ज्ञानम् अभ्यासात् ज्ञानात् ध्यानम् विशिष्यते
ध्यानात् कर्मफल-त्यागः त्यागात् शान्तिः अनन्तरम् ॥)
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भावार्थ :
किसी विषय का ज्ञान होने पर उसका अभ्यास करना, उसके ज्ञान से रहित अभ्यास किए जाने से श्रेष्ठ है, पुनः केवल (बौद्धिक या सैद्धान्तिक) ज्ञान की अपेक्षा ध्यान (ध्यानपूर्वक चित्त को विषय पर लगाना), अधिक श्रेष्ठ है । किन्तु ध्यान की भी अपेक्षा कर्मफल (से आसक्ति) का त्याग सर्वाधिक श्रेष्ठ है, उस त्याग से तत्काल ही वास्तविक शान्ति प्राप्त होती है । 
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’विशिष्यते’ / ’viśiṣyate’ - is superior in comparison,

Chapter 3, śloka 7,

yastvindriyāṇi manasā 
niyamyārabhate:'rjuna |
karmaendriyaiḥ karmayoga-
masaktaḥ sa viśiṣyate ||
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(yaḥ tu indriyāṇi manasā 
niyamya ārabhate arjuna |
karmendriyaiḥ karmayogam 
asaktaḥ saḥ viśiṣyate ||)
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Meaning :
(In comparison and contrast to the last shloka, ...) But one, who without indulging in the senses, with no attachment, by means of mind (wisdom) keeping the senses under control, directs them towards the yoga of action, is superior indeed.  
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Chapter 5, śloka 2,

sannyāsaḥ karmayogaśca 
niḥśreyasakarāvubhau |
tayostu karmasannyāsāt-
karmayogo viśiṣyate ||
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(sannyāsaḥ karmayogaḥ ca 
niḥśreyaskarau ubhau |
tayoḥ tu karmasannyāsāt 
karmayogaḥ viśiṣyate ||)
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Meaning :
Though the renunciation of action (karma-sannyās) as such, even without the proper understanding of yoga, and karmayoga, the later is superior to renunciation (without the proper understanding of yoga), for the obvious, - the following reasons*) 
*reasons : Giving up the wrong notion that actions are done by one independently by oneself, and failing to realize that all actions are done by the three attributes guṇa of  prakṛti only) both are equally very helpful in attainment of the Supreme Goal (’mokṣa’),   
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Chapter 6, śloka 9, 

suhṛnmitrāryudāsīna-
madhyasthadveṣyabandhuṣu |
sādhuṣvapi ca pāpeṣu 
samabuddhirviśiṣyate ||
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(suhṛt-mitra-ari-udāsīna-
madhyastha-dveṣya-bandhuṣu |
sādhuṣu api ca pāpeṣu 
samabuddhiḥ viśiṣyate ||)
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Meaning :
One who regards the honest well-wishers, friends, enemies, the neutrals between the mediators, those who try to help reconcile their differences, those who one does not like, the saints and sinners alike, with the same evenness of mind, is a yogi far advanced.
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Chapter 7, śloka 17,

teṣāṃ jñānī nityayukta 
ekabhaktirviśiṣyate |
priyo hi jñānino:'tyartham-
ahaṃ sa ca mama priyaḥ ||
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(teṣam jñānī nityayuktaḥ 
ekabhaktiḥ viśiṣyate |
priyaḥ hi jñāninaḥ atyartham 
aham saḥ ca mama priyaḥ ||
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Meaning :
(Of those for kinds of devotees, as described in the earlier shloka 16,) The jñānī, - the Realized in Me ever abides in Me, because being aware of Me in Essence. He is very dear to Me and I AM to Him, as is Self / Me only.
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Chapter 12, śloka 12,

śreyo hi jñānamabhyāsāj-
jñānāddhyānaṃ viśiṣyate |
dhyānātkarmaphalatyāgas-
tyāgācchāntiranantaram ||
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(śreyaḥ hi jñānam abhyāsāt 
jñānāt dhyānam viśiṣyate |
dhyānāt karmaphala-tyāgaḥ 
tyāgāt śāntiḥ anantaram ||)
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Meaning :
(Spiritual) Practice with knowledge is better than practice without knowledge, and attention (dhyāna) and consciousness, meditation and awareness of this consciousness / 'self ' / 'Self' is far better than that (practice). But the renunciation of the fruits of action (karmaphala-tyāga) / freedom from the desire is the best, through which the peace-supreme is attained in no time.  
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