Sunday, August 17, 2014

आज का श्लोक, ’विमृश्य’ / ’vimṛśya’

आज का श्लोक, ’विमृश्य’ / ’vimṛśya’
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’विमृश्य’ / ’vimṛśya’ - विमर्श करके, विवेचन के द्वारा,

अध्याय 18, श्लोक 63,

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
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(इति ते ज्ञानम् आख्यातम् गुह्यात् गुह्यतरम् मया ।
विमृश्य एतत् अशेषेण यथा इच्छसि तथा कुरु ॥)
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भावार्थ :
इस प्रकार से मेरे द्वारा तुम्हारे लिए गुह्य से भी अधिक गुह्य ज्ञान की व्याख्या कर दी गई । इस पर ध्यान से भलीभाँति पूर्ण विचार करो, और तुम्हारी जो इच्छा हो (जो तुम्हें उचित जान पड़े) वह करो ।
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’विमृश्य’ / ’vimṛśya’ - having deduced, concluding through investigation,

Chapter 18, śloka  63,

iti te jñānamākhyātaṃ
guhyādguhyataraṃ mayā |
vimṛśyaitadaśeṣeṇa
yathecchasi tathā kuru ||
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(iti te jñānam ākhyātam
guhyāt guhyataram mayā |
vimṛśya etat aśeṣeṇa
yathā icchasi tathā kuru ||)
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Meaning :
In this way I have enunciated before you the essence of the most secret eternal wisdom. Carefully investigate this and do as you like.
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