Thursday, August 28, 2014

आज का श्लोक, ’विद्यात्’ / ’vidyāt’

आज का श्लोक,
’विद्यात्’ / ’vidyāt’
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’विद्यात्’ / ’vidyāt’ - मनुष्य जाने कि, जाना जाता है कि,

अध्याय 6, श्लोक 23,

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णमानसः ।
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(तम् विद्यात् दुःखसंयोग-वियोगम् योगसञ्ज्ञितम् ।
सः निश्चयेन योक्तव्यः योगः अनिर्विण्णमानसः ॥)
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भावार्थ :
जो दुःख के संयोग से विरहित है -अर्थात् जिसमें दुःख का नितान्त अभाव है, जिसे योग की संज्ञा दी जाती है -अर्थात् जो ऐसा योग है, उसे इस प्रकार से निश्चयपूर्वक जानकर, उस योग को धैर्यसहित, बिना उकताए, अथक् प्रयास सहित, उत्साहपूर्ण चित्त से सिद्ध किया जाना चाहिए ।
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अध्याय 14, श्लोक 11,

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥
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(सर्वद्वारेषु देहे अस्मिन् प्रकाशः उपजायते ।
ज्ञानम् यदा तदा विद्यात् विवृद्धम् सत्त्वम् इति उत ॥)
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भावार्थ : मन पर तीनों गुणों का प्रभाव निरन्तर पड़ता रहता है । पिछले श्लोक 10 में बतलाया गया कि किस प्रकार एक समय पर एक ही गुण शेष दो गुणों को दबाकर मन पर आधिपत्य कर लेता है । इस क्रम में जिस समय सत्त्वगुण प्रबल होता है देह के सभी द्वारों (मन तथा इन्द्रियों में) चेतनता, निर्मलता तथा नीरोगता (स्वास्थ्य, आरोग्य) का विस्तार होता है, क्योंकि जैसा इसी अध्याय के पूर्व श्लोक क्रमांक 6 में कहा गया, सत्त्वगुण जो कि सुख से बाँधता है, इन्हीं का कारक है । और चूँकि ये तीनों दशाएँ आत्मा की सहज स्वाभाविक अवस्था है, इसलिए मनुष्य को इनमें सुख की प्रतीति तथा फलस्वरूप तज्जनित सुख का आभास भी होता है । यह अवस्था सत्त्व की प्रबलता और प्रचुरता की द्योतक है ।
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’विद्यात्’ / ’vidyāt’ - one should know / understand well,

Chapter 6, śloka 23,

taṃ vidyādduḥkhasaṃyoga-
viyogaṃ yogasañjñitam |
sa niścayena yoktavyo
yogo:'nirviṇṇamānasaḥ |
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(tam vidyāt duḥkha-saṃyoga-
viyogam yogasañjñitam |
saḥ niścayena yoktavyaḥ
yogaḥ anirviṇṇamānasaḥ ||)
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Meaning :
Know what is named 'yoga', is that which results in the end of association of sorrow. This should be carefully understood with conviction that such a state is achieved by firm resolve, untiring and zealous spirit.
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Chapter 14, śloka 11,

sarvadvāreṣu dehe:'smin-
prakāśa upajāyate |
jñānaṃ yadā tadā vidyād-
vivṛddhaṃ sattvamityuta ||
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(sarvadvāreṣu dehe asmin
prakāśaḥ upajāyate |
jñānam yadā tadā vidyāt 
vivṛddham sattvam iti uta ||)
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Meaning :
Mind functions by the force, and under the influence of the three attributes (guṇa-s) of manifestation (prakṛti). As explained in the śloka 6 of this Chapter, 'sattvaguṇa' has the qualities of  consciousness, harmony, joy, intelligence, clarity, purity and cleanliness, and absence of ill, when 'sattvaguṇa' predominates over the other two attributes (namely rajoguṇa and tamoguṇa,)  one feels just happy and peaceful, content, which are the revelations of the nature of the essential Reality / Self. This further becomes 'experience' and the 'memory'. Thus 'sattvaguṇa' causes the sense of happiness. And as a consequence binds with 'pleasure'. This is again a bondage only, -not the freedom. When this happens, it is the indication of the preponderance of  'sattvaguṇa'.
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