Sunday, August 17, 2014

आज का श्लोक, ’विमूढः’ / ’vimūḍhaḥ’

आज का श्लोक, ’विमूढः’ / ’vimūḍhaḥ’
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’विमूढः’ / ’vimūḍhaḥ’ - मोहित-बुद्धि, विचलित-बुद्धि है जिसकी,

अध्याय 6, श्लोक 38,

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥
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(कच्चित् न उभयविभ्रष्टः छिन्न अभ्रम् इव नश्यति ।
अप्रतिष्ठः महाबाहो विमूढः ब्रह्मणः पथि ॥)
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भावार्थ : (अर्जुन ने पिछले श्लोक में प्रश्न किया था :
जिसकी योग में श्रद्धा तो होती है, किन्तु योग में पूर्णता होने से पहले ही जो मृत्यु को प्राप्त हो जाता है उसकी हे कृष्ण क्या गति होती है?...इसी क्रम में अर्जुन आगे प्रश्न करते हैं...)
हे महाबाहो! क्या (वह) भगवत्-प्राप्ति के मार्ग में मोहित बुद्धि ही बना रहकर आश्रयरहित  दोनों ओर से छिन्न हुए मेघ की भाँति कहीं नष्ट तो नहीं हो जाता है?  
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’विमूढः’ / ’vimūḍhaḥ’ - of distracted mind,

Chapter 6, śloka 38,

kaccinnobhayavibhraṣṭa-
śchinnābhramiva naśyati |
apratiṣṭho mahābāho
vimūḍho brahmaṇaḥ pathi ||
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(kaccit na ubhayavibhraṣṭaḥ
chinna abhram iva naśyati |
apratiṣṭhaḥ mahābāho
vimūḍhaḥ brahmaṇaḥ pathi ||)
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Meaning :
(In the  śloka 37, arjuna had put his doubt before Lord kṛṣṇa about the state of one, who has though full trust in the path of yoga, fails in attaining perfection in this venture before his death, what fate he meets,...next, ...)
O kṛṣṇa ! because of his distracted mind is he strayed away from the way to Brahman and destroyed like a cloud that is torn on both the sides ?
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