Sunday, August 17, 2014

आज का श्लोक, ’विमुच्य’ / ’vimucya’

आज का श्लोक, ’विमुच्य’ / ’vimucya’
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’विमुच्य’ / ’vimucya’ - से मुक्त होकर, त्यागकर,

अध्याय 18, श्लोक 53,

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
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(अहङ्कारम् बलम् दर्पम् कामम् क्रोधम् परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तः ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥)
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भावार्थ :
(पूर्ववर्णित श्लोकों के क्रम में, ...) अहंकार, बल (आक्रामकता), दर्प (मिथ्या गर्व). काम, क्रोध, और परिग्रह (लोभवश संग्रह करने की प्रवृति), इन सब का परित्याग कर ममत्व (मेरापन) की भावना से रहित हुआ, शान्तचित्त मनुष्य सच्चिदानन्द ब्रह्म से अभिन्न हो जाता है ।
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’विमुच्य’ / ’vimucya’ - having renounced, having discarded,

Chapter 18, śloka 53,

ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ
kāmaṃ krodhaṃ parigraham |
vimucya nirmamaḥ śānto
brahmabhūyāya kalpate ||
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(ahaṅkāram balam darpam
kāmam krodham parigraham |
vimucya nirmamaḥ śāntaḥ
brahmabhūyāya kalpate ||)
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Meaning :
(In continuation to the earlier  51, 52,...)
Having renounced ego (ahaṅkāra), aggressiveness (bala), pride (darpa), desire (kāma), anger (krodha), and possessiveness (parigraha), given-up sense of me and mine (mamatva) thus having attained the spontaneous ego-less state of being ( nirmamatva) such a man abiding in peace Supreme, attains Brahman and merges in Brahman.  
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