Saturday, August 30, 2014

आज का श्लोक, ’विदित्वा’ / ’viditvā’

आज का श्लोक, ’विदित्वा’ / ’viditvā’
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’विदित्वा’ / ’viditvā’ - जानकर,

अध्याय 2, श्लोक 25,

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनम् नानुशोचितुमर्हसि ॥
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(अव्यक्तः अयम् अचिन्त्यः अयम् अविकार्यः अयम् उच्यते ।
तस्मात् एवम् विदित्वा एनम् न अनुशोचितुम् अर्हसि ॥)
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भावार्थ :
यह (आत्मा) अव्यक्त, यह (आत्मा) अचिन्त्य, तथा यह (आत्मा) अविकार्य कही जाती है । इसलिए इस (आत्मा) को इस प्रकार से इसके स्वरूप में जानने पर, युम्हें इसके लिए शोक करना उचित नहीं है ।
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अध्याय 8, श्लोक 28,

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
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(वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत् पुण्यफलम् प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत् सर्वम् इदम् विदित्वा योगी परम् स्थानम् उपैति च आद्यम् ॥)
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भावार्थ :
वेदों ( के अध्ययन), यज्ञों (के अनुष्ठान), तपों (के पूर्ण करने) तथा विभिन्न प्रकार के दान देने आदि से जिस पुण्यफल की प्राप्ति निर्दिष्ट की गई है, योगी निःसन्देह उस सब को लांघकर इस आद्य सनातन एवं शाश्वत् स्थान को प्राप्त हो जाता है ।
[टिप्पणी : समस्त पुण्यफल उनके उपभोग के साथ ही नष्ट हो जाते हैं, किन्तु योगी (इस अध्याय के श्लोक 11 में वर्णित) ’पद’ कॊ प्राप्त होकर उससे एक हो जाता है ।]
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’विदित्वा’ / ’viditvā’ - having known thus,

Chapter 2, śloka 25,

avyakto:'yamacintyo:'ya-
mavikāryo:'yamucyate |
tasmādevaṃ viditvainam
nānuśocitumarhasi ||
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(avyaktaḥ ayam acintyaḥ ayam
avikāryaḥ ayam ucyate |
tasmāt evam viditvā enam
na anuśocitum arhasi ||)
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Meaning :
This (Self) is described as immanent, This (Self) is described as inconceivable, This (Self) is described as immutable, therefore having known thus, you are not supposed to grieve for / after this.
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Chapter 8, śloka 28,

vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva
dāneṣu yatpuṇyaphalaṃ pradiṣṭam |
atyeti tatsarvamidaṃ viditvā
yogī paraṃ sthānamupaiti cādyam ||
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(vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva
dāneṣu yat puṇyaphalam pradiṣṭam |
atyeti tat sarvam idam viditvā
yogī param sthānam upaiti ca ādyam ||)
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Meaning :
The yogī who knows this abode of The Supreme Reality (as explained in śloka 8 of this chapter 8) transcends all fruits that are obtained through the study of veda-s, performing the sacrifices of all kinds, or doing austerities and penances, (because they are destroyed with their enjoyments) while by knowing the indestructible, begin-less Supreme abode of oneself, one merges into That.
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