Saturday, August 30, 2014

आज का श्लोक, ’विजानीयाम्’ / ’vijānīyām’

आज का श्लोक,
’विजानीयाम्’ / ’vijānīyām’ 
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’विजानीयाम्’ / ’vijānīyām’ - मैं जानूँ, मैं जान सकता हूँ,

अध्याय 4, श्लोक 4,

अर्जुन उवाच :
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥
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(अपरम् भवतः जन्म परम् जन्म विवस्वतः ।
कथम् एतत् विजानीयाम् त्वम् आदौ प्रोक्तवान् इति ॥ )
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भावार्थ : अर्जुन ने कहा -
(हे कृष्ण!) आपका जन्म तो इस काल में हुआ जबकि विवस्वान् का जन्म बहुत पहले, अत्यन्त प्राचीन समय (सृष्टि के प्रारंभ) में हुआ था । तो मैं इसे कैसे समझूँ कि आपने सृष्टि के प्रारम्भ (आदि) में उनसे योग के रहस्य को कहा था?
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’विजानीयाम्’ / ’vijānīyām’ - may I know, I shall know for certain,

Chapter 4, śloka 4,
 
arjuna uvāca :

aparaṃ bhavato janma 
paraṃ janma vivasvataḥ |
kathametadvijānīyāṃ 
tvamādau proktavāniti ||
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(aparam bhavataḥ janma 
param janma vivasvataḥ |
katham etat vijānīyām 
tvam ādau proktavān iti || )
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Meaning : arjuna asked -
You were born in these present times, quite a very long time after and later than vivasvān, who was born in the beginning of the creation (sṛṣṭi). (O kṛṣṇa !) How may I agree that you had told him the secret of yoga?  
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