Wednesday, August 27, 2014

आज का श्लोक, ’विनाशः’ / ’vināśaḥ’

आज का श्लोक, ’विनाशः’ / ’vināśaḥ’
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’विनाशः’ / ’vināśaḥ’  - नाश, क्षति,

अध्याय 6, श्लोक 40,

श्रीभगवानुवाच :

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥
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(पार्थ न एव इह न अमुत्र विनाशः तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गतिम् तात गच्छति ॥)
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भावार्थ :
भगवान् श्रीकृष्ण बोले :
हे पार्थ (अर्जुन) ! उस मनुष्य का न तो यहाँ (इस लोक में) और न ही वहाँ (उस लोक में, मृत्यु हो जाने के अनन्तर भी), क्षति / विनाश होता है । (श्लोक 37 में पूछे गए प्रश्न के सन्दर्भ में), हे तात (अर्जुन)! अपने आत्मोद्धार हेतु योग में श्रद्धापूर्वकसंलग्नचित्त कोई भी मनुष्य कभी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता ।  
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’विनाशः’ / ’vināśaḥ’  - destruction,

Chapter 6, śloka 40,

śrībhagavānuvāca :

pārtha naiveha nāmutra
vināśastasya vidyate |
na hi kalyāṇakṛtkaścid-
durgatiṃ tāta gacchati ||
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(pārtha na eva iha na amutra
vināśaḥ tasya vidyate |
na hi kalyāṇakṛt kaścit
durgatim tāta gacchati ||)
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Meaning :
bhagavān śrīkṛṣṇa
says : pārtha (arjuna) ! No one, here (in this life) or in the world next (the life here-after), who is earnestly engaged in making efforts for his ultimate good ( kalyāṇa), is destroyed.
O tāta (arjuna)!  Such a man never meets adversities on the path of yoga.
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Note :  tāta > an address to elders or youngs alike, denoting love and affection
The Hindi equivalent is 'dādā'  /  'दादा', that becomes 'Dad /Daddy' in English.
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