Wednesday, August 27, 2014

आज का श्लोक, ’विनिश्चितैः’ / ’viniścitaiḥ’

आज का श्लोक, ’विनिश्चितैः’ / ’viniścitaiḥ’ 
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’विनिश्चितैः’ / ’viniścitaiḥ’ - (विवेचनाओं के माध्यम से) सुनिश्चित,
अध्याय 13, श्लोक 4,

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्  ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव  हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः  ॥
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ऋषिभिः बहुधा गीतं छन्दोभिः विविधैः पृथक्  ।
ब्रह्मसूत्रपदैः च एव हेतुमद्भिः विनिश्चितैः  ॥
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भावार्थ :
(इस, क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ के ज्ञान को) ऋषियों ने अनेक प्रकार से गीतों में, विविध और भिन्न-भिन्न वेदमंत्रों में वर्णित किया है, विभिन्न रीतियों और युक्तियों से  पुनः ब्रह्मसूत्र के पदों में भी इसे प्रतिपादित और विवेचनाओं के माध्यम से  सुनिश्चित किया गया है ।
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’विनिश्चितैः’ / ’viniścitaiḥ’ - concluded, ultimately reached, 

Chapter 13, śloka 4,

ṛṣibhirbahudhā gītaṃ 
chandobhirvividhaiḥ pṛthak  |
brahmasūtrapadaiścaiva  
hetumadbhirviniścitaiḥ  ||
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(ṛṣibhiḥ bahudhā gītaṃ 
chandobhiḥ vividhaiḥ pṛthak  |
brahmasūtrapadaiḥ ca eva 
hetumadbhiḥ viniścitaiḥ  ||)
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Meaning :
Seers and sages have sung in various ways, and arrived at this through reasoning of the supreme kind, -the truth (of kṣetra and kṣetrajña, where-in puruṣa is only the see-er / 'the observer', while prakṛti  phenomenon / manifestation is 'the observed' only.) 
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Note :
hetumadbhiḥ - by means of reasoning.

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