Saturday, September 27, 2014

15/4,

आज का श्लोक,
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अध्याय 15, श्लोक 4,

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
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(ततः पदम् तत् परिमार्गितव्यम्
यस्मिन् गताः न निवर्तन्ति भूयः ।
तम् एव आद्यम् पुरुषम् प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥)
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भावार्थ :
(पिछले श्लोक 3 में कहे गए ’असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ से आगे तुरन्त बाद  यह श्लोक ’ततः’ से प्रारम्भ होता है।  दृढ वैराग्यरूपी शस्त्र से उस संसार-रूपी, या मन-रूपी अश्वत्थ को काटकर), तब उस पद के संबंध में ध्यान से अनुसंधान किया जाना चाहिए, जिसमें गए हुए पुनः संसार में नहीं लौटते । उसी आद्य पुरुष की शरण में (मैं) जाता हूँ जहाँ से / जिससे कि संसार-रूपी (या मन-रूपी) पुरातन प्रवृत्ति उद्भूत् होती है ।
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टिप्पणी :
यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा ’प्रपद्ये’ शब्द का प्रयोग दृष्टव्य है । ’प्रपद्ये’ का अर्थ है,  ’की दिशा में जाता हूँ’ ।
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Chapter 15, śloka 4,

tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ
yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ |
tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye
yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||
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(tataḥ padam tat parimārgitavyam
yasmin gatāḥ na nivartanti bhūyaḥ |
tam eva ādyam puruṣam prapadye
yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||)
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Meaning :
(The previous śloka 3, ends with the words 'asaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā', and immediately there-after, this śloka 4, starts with the word 'tataḥ', meaning 'next', 'then' ... having cut asunder this aśvattha-tree, which is either the world of our perceptions and its image in the mind, or the mind itself made of diverse modes ’vṛtti-s’, then, ...)
Then one should inquire with keen attention and earnestness into that state (the Brahman), which having once attained, one never returns to this mundane existence full of sorrow. He (That State) is the primordial puruṣa eternal, Who is the origin, from where emanate  the everlasting tendencies in the form of mind / world.
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Note :
The word 'prapadye' used here by Lord śrīkṛṣṇa, is evident that He preaches, what He practices.
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