Wednesday, September 24, 2014

आज का श्लोक, ’रसः’ / ’rasaḥ’,

आज का श्लोक, ’रसः’ / ’rasaḥ’ 
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 ’रसः’ / ’rasaḥ’ - आसक्ति, सुख की आशा, जल-तत्व (आप्) की तन्मात्रा,

अध्याय 2, श्लोक 59,

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
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(विषयाः विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जम् रसः अपि अस्य परम् दृष्ट्वा निवर्तते ।)
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भावार्थ :
जो मनुष्य इन्द्रियों से विषयों का सेवन नहीं करता, उसकी विषयों से तो निवृत्ति हो जाती है (किन्तु विषयों से आसक्ति, अर्थात् उनमें सुख है ऐसी बुद्धि निवृत्त नहीं हो पाती) किन्तु जिसने परमात्मा का दर्शन कर लिया है, उसकी ऐसी सुख-बुद्धि अर्थात् लालसा (रसवर्जना) और आसक्ति भी उस दर्शन से सर्वथा निवृत्त हो जाती है ।
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टिप्पणी :
लालसा को रसवर्ज इसलिए कहते हैं, क्योंकि लालसा सुख के अभाव का ही द्योतक होती है ।  जब तक लालसा होती है, सुख नहीं होता । और लालसा तृप्त हो जाने पर भी  सुख नहीं रहता । केवल उसके पूर्ण होने की प्रतीति के समय में कभी कभी सुख का आभास होता है, और वह आभास भी बाद में शेष नहीं रहता ।
विकल्प से, यदि हम ’रसवर्जम्’ को कर्म अर्थात् द्वितीया विभक्ति के अर्थ में ग्रहण करें तो वह ’परम्’ के तुल्य होकर ’ब्रह्म’ का पर्याय है, चूँकि ’ब्रह्म’ स्वयं ही रसस्वरूप अद्वैत तत्व है जिसका आनन्द लेनेवाला उससे अन्य नहीं है, इसलिए उसमें इस दृष्टि से रस का भी अत्यन्त अभाव है ।
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अध्याय 7, श्लोक 8,

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥
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(रसः अहम् अप्सु कौन्तेय प्रभा अस्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषम् नृषु ॥)
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भावार्थ :
हे कौन्तेय (अर्जुन)! जलों में ’रस’ नामक तन्मात्रा, चन्द्रमा एवं सूर्य में प्रकाश (प्रतिबिम्बित आभास अर्थात् चैतन्य),  समस्त वेदों में प्रणव अर्थात् ओंकार, तथा आकाश में शब्द, और मनुष्यों में पौरुष हूँ ।
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टिप्पणी :
पञ्च तन्मात्राएँ पञ्च-प्राणों के गुणधर्मवाली हैं । इसलिए रस, स्पर्श, गन्ध, शब्द, तथा प्रकाश, ’समान’, ’व्यान’, ’अपान’, ’उदान’, तथा प्राण के समान धर्मवाले हैं । इस दृष्टि से जल तत्त्वतः रस है । चन्द्रमा एवं सूर्य आदि में दिखलाई देनेवाला प्रकाश / अग्नि / ’प्रभा’ किसी चेतन सत्ता के लिए, उस (चेतन सत्ता) के ही प्रमाण से अस्तित्वमान है । वह चेतन-सत्ता ’प्रकाश’ को प्रमाण है, न कि प्रकाश उसका (प्रमाण) । शब्द ’आकाश’ का गुण है, गन्ध पृथ्वी का, ’प्रणव’ वेद का, प्रकाश सूर्य तथा चन्द्र अर्थात् अग्नि का, और पौरुष / चेतनता जीवमात्र का । ’आकाश’ का तात्पर्य यहाँ स्थान-विशेष से है जैसे वायु से युक्त स्थान, जल या अन्य किसी पदार्थ में व्याप्त ’स्थान’ ।
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’रसः’ / ’rasaḥ’  -  craving for the pleasures, longing for, essence (tanmātrā) of water,

Chapter 2, śloka 59,

viṣayā vinivartante
nirāhārasya dehinaḥ |
rasavarjaṃ raso:'pyasya
paraṃ dṛṣṭvā nivartate ||
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(viṣayāḥ vinivartante
nirāhārasya dehinaḥ |
rasavarjam rasaḥ api asya
param dṛṣṭvā nivartate |)
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Meaning :
One who abstains from objects (of the senses) is of course free from them, but his craving for the pleasures (and aversion to the pains) that seem to come from those (gross and subtle) objects ceases not. However, One who has realized the Supreme (Brahman that is Bliss), attains freedom from the cravings also.
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Chapter 7, śloka 8,

raso:'hamapsu kaunteya
prabhāsmi śaśisūryayoḥ |
praṇavaḥ sarvavedeṣu
śabdaḥ khe pauruṣaṃ nṛṣu ||
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(rasaḥ aham apsu kaunteya
prabhā asmi śaśisūryayoḥ |
praṇavaḥ sarvavedeṣu
śabdaḥ khe pauruṣam nṛṣu ||)
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Meaning : O kaunteya, arjuna, the essence of the flow / taste, (rasa) of water, the light of the Moon and the Sun, The One sacred syllable (praṇava / OM) of the veda, I am the sound in the space, and consciousness / life in the humans / beings.
Note :
The 5 elements (mahābhūta) and 5 vital forces (prāṇa), and 5 gross elements (sthūlabhūta) are essence of one-another. Their manifest qualities (guṇa) as is perceived by the 5 senses, - flow (taste), touch, smell, sound, and sight (vision) respectively are synonymous of water, air, earth, space and light. These 5 senses are 'tanmātrā'. The 'Light' is a bit of a different quality (guṇa), that the one emitted by the Sun and the Moon (or fire) is directly revealed to 'one', 'seen' by one, by a 'conscious entity', and while it proves the existence of 'one', -a 'conscious entity' in the human body, the other four (senses) are but inferred only.  The 'conscious entity' or the 'consciousness' that is associated with a specific body (pura) is (puruṣa). The physical body may be a 'male' or a 'female', but the 'consciousness' that claims one-self the owner of the body is always beyond the attributes of the body. The 'male' / 'female' applies to the body only.
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