Friday, September 19, 2014

7/28,

आज का श्लोक,
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अध्याय 7, श्लोक 28,

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
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(येषाम् तु अन्तगतम् पापम् जनानाम् पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः भजन्ते माम् दृढव्रताः ॥)
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भावार्थ :
(इच्छा और द्वेष से उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्व तथा मोह को लेकर ही मनुष्यमात्र जन्म लेता है, ऐसा पिछले श्लोक 27 में कहा गया, उसी के बारे में आगे कहते हैं कि ऐसे मनुष्यों में से भी),
जिन पुण्यकर्म करनेवाले मनुष्यों का पाप नष्ट हो गया है, द्वन्द्व तथा मोह से मुक्त हुए वे दृढव्रती / दृढ संकल्पयुक्त, मुझे भजते हैं ।
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टिप्पणी :
देह से युक्त चेतन अपने को देह तक सीमित अनुभव करता हुआ जीव-भाव में बद्ध हो जाता है । अपने चेतन स्वरूप पर देह / जगत् रूपी आवरण तथा जगत् से अपने-आपके भिन्न होने की प्रतीति, ये दोनों उसके (अपने चैतन्य होने के) सहज सत्य पर आवरण डालते हैं और उसकी दृष्टि में विक्षेप पैदा कर देते हैं । ’आवरण’ और ’विक्षेप’ प्रकृति की ये दो शक्तियाँ जीव-भाव को सृजित करती हैं, या कहें कि उससे अभिन्न हैं । जगत् में दुःख की प्रतीति उसे ’अपने’ बारे में चिन्ता करने के लिए बाध्य करती है । वह जगत् में सुख प्राप्ति की आशा करता है, किन्तु कोई कोई ही इस आशा की निरर्थकता को देख-समझ पाता है, और उसे स्पष्ट हो जाता है कि जगत् / संसार में सुख नहीं है, इसलिए प्राप्त भी कैसे होगा, यदि कभी प्राप्त होता प्रतीत भी होता है तो वह मन की सिर्फ़ एक कल्पना चित्त का विक्षेप मात्र है । यह समझ में आना प्रकृति या परमात्मा की ’अनुग्रह’ शक्ति है । जीव-जगत् की लीला इन तीन शक्तियों का विलास मात्र है । आवरण और विक्षेप ही द्वन्द्व तथा मोह हैं जो इच्छा तथा द्वेष से अभिन्न हैं ।
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Chapter 7, śloka 28,

yeṣāṃ tvantagataṃ pāpaṃ
janānāṃ puṇyakarmaṇām |
te dvandvamohanirmuktā
bhajante māṃ dṛḍhavratāḥ ||
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(yeṣām tu antagatam pāpam
janānām puṇyakarmaṇām |
te dvandvamohanirmuktāḥ
bhajante mām dṛḍhavratāḥ ||)
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Meaning :
(In the previous śloka 27, it has been stated that all and every human being is born with a mind occupied with doubt (dvandva / confusion) and delusion (moha) that are with him because are the result of desire (icchā)and envy (dveṣa)
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Note :
A 'self' in a body is because of desire and ignorance of the true nature of the self / consciousness. Because There is a body, that is 'found' in a world, the consciousness confined within the body is occupied with the idea of being some-one, a 'self'. This limitedness causes sense of incompleteness and desire and envy follow. The two powers of prakṛti / manifestation, namely āvaraṇa and vikṣepa, create desire and envy in the mind of such a 'self'. There is yet another power of anugraha (Grace) there in prakṛti / manifestation, that prompts one to think of this whole game and lets him break the bondage of sorrow, the cycle of birth and rebirth, and regain / realize the Reality inherent.
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