Sunday, September 14, 2014

आज का श्लोक, ’रागद्वेषौ’ / ’rāgadveṣau’

आज का श्लोक,
’रागद्वेषौ’ / ’rāgadveṣau’
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’रागद्वेषौ’ / ’rāgadveṣau’ - राग तथा द्वेष,

अध्याय 3, श्लोक 34,

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
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(इन्द्रियस्य-इन्द्रियस्य-अर्थे राग-द्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयो न वशम् आगच्छेत् तौ हि अस्य परिपन्थिनौ ॥
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भावार्थ :
प्रत्येक ही इन्द्रिय से उस इन्द्रिय-विशेष के विषय-विशेष के संबंध में राग तथा द्वेष दोनों जुड़े होते हैं । अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के लिए उसके विषयों में से कुछ तो मन के लिए सुखद होते हैं, जबकि कुछ दुःखद भी होते हैं, और चूँकि इन्द्रियों से मन / चेतना का तादात्म्य होने पर ही उन सुखों अथवा दुःखों को अनुभव और उनका भोग किया जाना संभव होता है, इसलिए वे दोनों (राग और द्वेष) योग-साधन में विघ्न होते हैं । इसलिए योग-साधन में संलग्न मनुष्य को चाहिए कि वह राग तथा द्वेष के वश में न आए ।
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टिप्पणी :
यहाँ पातञ्जल योगसूत्र के द्वितीय अध्याय, साधनपाद के सूत्र क्रमांक 7 एवं 8 दृष्टव्य हैं -
सुखानुशयी रागः ॥7॥
दुःखानुशयी द्वेषः ॥8॥
मन को, जिस विषय में सुख की प्रतीति होती है उससे राग (आसक्ति, लिप्तता), तथा जिस विषय में दुःख की प्रतीति होती है उससे द्वेष (विरक्ति, विराग) होता है ।  इसलिए ये दोनों परस्पर अभिन्न रूप से जुड़े हैं । जब तक एक है, दूसरा भी रहेगा ही ।
वैराग्य का अर्थ है राग तथा विराग दोनों से अप्रभावित रहना ।
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अध्याय 18, श्लोक 51,

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयान्स्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
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(बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः धृत्या आत्मानम् नियम्य च ।
शब्दादीन् विषयान् त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥)
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भावार्थ :
शुद्ध हुई बुद्धि से युक्त, ध्यान (धृति) को अपने स्वरूप अर्थात् आत्म-तत्व (शुद्ध चैतन्य मात्र) में स्थिर रखते हुए, शब्द आदि विषयों को त्यागकर (अर्थात् उन्हें मन में स्थान न देते हुए) राग तथा द्वेष को  जड से उखाडकर सर्वथा नष्ट कर देनेवाले का, ...
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’रागद्वेषौ’ / ’rāgadveṣau’ - attachment (rāga) / liking, and dislike / aversion (dveṣa).

Chapter 3, śloka 34,

indriyasyendriyasyārthe
rāgadveṣau vyavasthitau |
tayorna vaśamāgacchet-
tau hyasya paripanthinau ||
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(indriyasya-indriyasya-arthe
rāga-dveṣau vyavasthitau |
tayo na vaśam āgacchet
tau hi asya paripanthinau ||
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Meaning :
In relation to its specific object, each sense has its attachment (rāga)  and aversion (dveṣa) . Accordingly, the pleasure or pain is experienced when the object of experience is either pleasant or unpleasant. And this happens only when the mind is identified with the paricular sense. Thus when the mind is identified with the sense of sight, it experiences beauty or ugliness. The object that is pleasant causes attachment, while the one that is unpleasant causes pain. In this way attachment and aversion are hidden in the relationship between the senses and their particular object. Attachment (rāga) and aversion (dveṣa ) thus become hurdles in progress in yoga. It is the 'mind' that is caught into this conflict, and should extricate itself on its own, by understanding this fact.
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Note :
Pleasure (sukha) and pain (duḥkh) and attachment (rāga) and aversion (dveṣa) could be understood even in a better way with the help of the following
pātañjala yogasūtra, (chapter 2,)
sukhānuśayī rāgaḥ ॥7॥
duḥkhānuśayī dveṣaḥ ॥8॥
Attachment (rāga) follows feeling of pleasure (sukha), aversion (dveṣa) follows feeling of pain  (duḥkh) .
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Chapter 18, śloka 51,

buddhyā viśuddhayā yukto
dhṛtyātmānaṃ niyamya ca |
śabdādīnviṣayānstyaktvā
rāgadveṣau vyudasya ca ||
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(buddhyā viśuddhayā yuktaḥ
dhṛtyā ātmānam niyamya ca |
śabdādīn viṣayān tyaktvā
ragadveṣau vyudasya ca ||)
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Meaning :
Through the intellect that is purified, attention that is focused on the (one's own and very) Self, renouncing (ignoring the perception of) 5 sense-objects, namely sound, sight, taste, touch and smell, and mind made free from attachment and jealousy.      
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