Wednesday, September 17, 2014

5/17,

आज का श्लोक,
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अध्याय 5, श्लोक 17,

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा ॥
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(तत्-बुद्धयः तदात्मनः तन्निष्ठाः तत्परायणाः ।
गच्छन्ति अपुनरावृत्तिम् ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥)
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भावार्थ :
उस ज्ञानसे युक्त बुद्धिवाले, उससे अपने (अपनी आत्मा) को अभिन्न जाननेवाले, उसमें जिनकी सहज निष्ठा है, और जो उसके प्रति समर्पित हैं, जिनके सम्पूर्ण पाप ज्ञान से प्रक्षालन होने से धुल गए हैं, वे उस परा गति को प्राप्त होते हैं, जहाँ से पुनः संसार में नहीं लौटते ।
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Chapter 5, śloka 17,

tadbuddhayastadātmānas-
tanniṣṭhāstatparāyaṇāḥ |
gacchantyapunarāvṛttiṃ
jñānanirdhūtakalmaṣā ||
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(tat-buddhayaḥ tadātmanaḥ
tanniṣṭhāḥ tatparāyaṇāḥ |
gacchanti apunarāvṛttim
jñānanirdhūtakalmaṣāḥ ||)
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Meaning :
Those who have attained that wisdom (awareness of the Self), Who are well-established in That, who have a firm conviction in That Self, and are dedicated to That, such who have been freed of the sin, attain the state Supreme from where there is no more return (to this world of sorrow).
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