Saturday, September 20, 2014

8/2,

आज का श्लोक,
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अध्याय 8, श्लोक 2,

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
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(अधियज्ञः कथं कः अत्र देहे अस्मिन् मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथम् ज्ञेयः असि नियतात्मभिः ॥)
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भावार्थ :
हे मधुसूदन (कृष्ण)!  यहाँ (श्लोक 1 में वर्णित 7 तत्वों के संबंध में) जिसे अधियज्ञ कहा जाता है, वह किस प्रकार (के स्वरूप) का और कौन है? और देहत्याग के समय नियत योगसाधन करनेवाले सुपात्र मनुष्य आपको किस रूप में जानते हैं ?
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टिप्पणी :
अध्याय 8 के श्लोक 1 में जिन 7 तत्वों के बारे में प्रश्न किया गया इनके लिए ’किम्’ अर्थात् ’क्या’ सर्वनाम का प्रयोग है, जो चेतन्-अचेतन दोनों प्रकार की वस्तुओं के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि इस श्लोक 2 में अधियज्ञ के (स्वरूप के) संअबंध में जिज्ञासा करते समय अर्जुन / महर्षि वेदव्यासजी ने ’को’ अर्थात् ’कौन’ सर्वनाम का प्रयोग किया है । स्पष्ट है कि यह सर्वनाम केवल चेतन सत्ता के लिए ही प्रयोग किया जाता है । यहाँ इस सर्वनाम के प्रयोग में दो बातें और द्रष्टव्य हैं, चूँकि एक ही चेतन सत्ता उपाधि-भेद से जीव तथा शिव अर्थात् जीव और परमेश्वर है, इसलिए अधियज्ञ इनमें से कौन है? दूसरे शब्दों में, ’अत्र’ अर्थात् ’यहाँ’ इस विशेषण / क्रियाविशेषण के साथ प्रयाणकाल का उल्लेख प्रश्न को ’कोऽहम्’ के रूप में अर्थात् आत्म्-स्वरूप की जिज्ञासा के रूप में ढाल देता है । चूँकि इस ग्रन्थ में अन्यत्र यज्ञ तथा कर्म को स्वरूपतः अभिन्न कहा गया है, इसलिए श्लोक 1 में वर्णित 7 प्रकट और प्रत्यक्ष तत्वों के प्रकट होने से से पूर्व ’जो है’ उसे ही ’अधियज्ञ’ कहा जाना अनुचित नहीं होगा । अगले श्लोकों 3, 4 तथा 5 में हम इस पर ध्यान देंगे ।
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Chapter 8, śloka 2,

adhiyajñaḥ kathaṃ ko:'tra
dehe:'sminmadhusūdana |
prayāṇakāle ca kathaṃ
jñeyo:'si niyatātmabhiḥ ||
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(adhiyajñaḥ kathaṃ kaḥ atra
dehe asmin madhusūdana |
prayāṇakāle ca katham
jñeyaḥ asi niyatātmabhiḥ ||)
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Meaning :
Here in this body, O madhusūdana (kṛṣṇa)! What is the adhiyajña, How and Who is this adhiyajña, - the one associated with this body ? And how, those who have devotedly and sincerely practiced yoga, shall know You at the time of death?
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Note :
With reference to the earlier śloka 1 of this Chapter 8, we see the 7 factores / elements there-in were mentioned in the form of demonstrative pronoun ’किम्’ / 'kim’, - meaning 'what', which is used to denote a sentient / insentient object both, while in the present śloka 2, the demonstrative pronoun ’कः’ / kaḥ / 'who?' has been applied to indicate adhiyajña, which is used strictly for a sentient one only. Again, there are only 2 such sentient objects / conscious entities accepted in veda, namely the individual soul (self) and the Supreme, which of the two has been referred to here by this term adhiyajña / अधियज्ञः ? This is further emphasised by the use of the term ’अत्र’ / 'atra' /  here, and talking about the time of discarding the body (death). Elsewhere in Gita, we see yajña is equated with karma, and in śloka 1, we find  'karma' as one of those 7 factors, we can stay convinced that adhiyajña means the primal cause, prior to manifestation of those 7 elemenys as are described in śloka 1. We can conveniently check that this term points at the consciousness associated with the body. Namely to the sense of 'I'. This question in śloka 2, then takes the form of 'self-enquiry'. We shall think about this in the oncoming śloka-s 3, 4 and 5.
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