Wednesday, September 24, 2014

आज का श्लोक, ’रविः’ / ’raviḥ’

आज का श्लोक, ’रविः’ / ’raviḥ’ 
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’रविः’ / ’raviḥ’ - सूर्य,

अध्याय 10, श्लोक 21,

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥
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आदित्यनाम् अहम् विष्णुः ज्योतिषाम् रविः अंशुमान् ।
मरीचिः मरुताम् अस्मि नक्षत्राणाम् अहम् शशी ॥)
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भावार्थ :
अदिति के बारह पुत्रों (आदित्यों) में मैं विष्णु, तथा ज्योतियों में रश्मियों का स्वामी सूर्य, मरुतों में विद्यमान मरीचि अर्थात् तेज हूँ, और नक्षत्रों का स्वामी मैं चन्द्रमा ।
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अध्याय 13, श्लोक 33,

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥
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(यथा प्रकाशयति एकः कृत्स्नम् लोकम् इमम् रविः
क्षेत्रम् क्षेत्री तथा कृत्स्नम् प्रकाशयति भारत ॥)
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भावार्थ :
जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण जगत् को आलोकित करता है, उसी प्रकार हे भारत (अर्जुन)! एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ), सम्पूर्ण क्षेत्र को आलोकित करता है ।
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टिप्पणी :
क्षेत्र तथा क्षेत्री / क्षेत्र के बारे में इस अध्याय के प्रथम श्लोक में ही स्पष्ट कह दिया गया है, अर्थात् यह शरीर ही क्षेत्र है, जबकि इस शरीर को जाननेवाला, इसे ’मेरा’ कहनेवाला चेतन तत्व (चेतना / बोध) ही क्षेत्रज्ञ है ।
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’रविः’  / ’raviḥ’  - the Sun

Chapter 10, śloka 21,

ādityānāmahaṃ viṣṇur-
jyotiṣāṃ raviraṃśumān |
marīcirmarutāmasmi
nakṣatrāṇāmahaṃ śaśī ||
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ādityanām ahaṃ viṣṇuḥ
jyotiṣām raviḥ aṃśumān |
marīciḥ marutām asmi
nakṣatrāṇām aham śaśī ||)
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Meaning :
Aong the 12 sons of aditi, I AM viṣṇu,  Among the luminaries (heavenly Lights), the Sun Radiant, of the 49 marut-s, marīci  I AM, among the constellations, the Moon I AM.
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Chapter 13, śloka 33,

yathā prakāśayatyekaḥ
kṛtsnaṃ lokamimaṃ raviḥ |
kṣetraṃ kṣetrī tathā kṛtsnaṃ
prakāśayati bhārata ||
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(yathā prakāśayati ekaḥ
kṛtsnam lokam imam raviḥ |
kṣetram kṣetrī tathā kṛtsnam
prakāśayati bhārata ||)
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Meaning :
Just like the Sun, who alone illuminates this whole world, the one Intelligence (kṣetrī, - who is the only support and evidence of all) / kṣetrajña alone illuminates the whole field (kṣetra) of perception.  
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Note :
1. In relation to a physical body, namely a person, the kṣetra (field) of his perceptions defines and illuminates his 'world'. Similarly, O bhārata (arjuna) ! In relation to the Whole existence, The Self / Supreme Intelligence, is the One alone, that supports the Whole world.
2. In the very beginning of this Chapter 13, śloka 1, the terms kṣetra and kṣetrajña / kṣetrī,  have been already well-defined. Accordingly, this body is termed as kṣetra (field), while the consciousness that is aware of having this body as 'mine' is termed as kṣetrajña / kṣetrī.
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