Wednesday, September 24, 2014

आज का श्लोक, ’रजः’ / ’rajaḥ’

आज का श्लोक, ’रजः’ / ’rajaḥ’
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’रजः’ / ’rajaḥ’ - रजोगुण, चञ्चलता, विक्षेप, व्यग्रता,

अध्याय 14, श्लोक 5,

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
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(सत्त्वम् रजः तमः इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनम् अव्ययम् ॥)
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भावार्थ :
हे महाबाहु (अर्जुन)! सत्त्वगुण, रजोगुण, एवं तमोगुण प्रकृति से उत्पन्न ये तीनों गुण अविनाशी स्वरूप वाले देही (चेतन-तत्त्व) को देह में बाँधते हैं ।
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अध्याय 14, श्लोक 7,

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥
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(रजः रागात्मकम् विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तत् निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥)
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भावार्थ :
हे कौन्तेय (अर्जुन)! रागके स्वरूपवाले  रजोगुण को कामना (लालसा) तथा आसक्ति (लिप्तता) से उत्पन्न हुआ जानो, जो (रजोगुण) देह के स्वामी (जीव) को कर्म तथा उसके फल की आशा से बाँधता है ।
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अध्याय 14, श्लोक 9,

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्त्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥
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(सत्त्वम् सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयति उत ॥)
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भावार्थ :
(आत्मा के स्वाभाविक स्वरूप को आवृत्त कर) सत्त्वगुण तो चित्त को सुख में प्रवृत्त करता है, रजोगुण कर्म में प्रवृत्त करता है, तथा हे भारत (अर्जुन)! तमोगुण ज्ञान को ढाँककर चित्त को प्रमाद में प्रवृत्त करता है ।)
टिप्पणी : इस प्रकार तीनों गुण आत्मा के स्वरूप को आवरित रखते हैं ।
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अध्याय 14, श्लोक 10,

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥
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(रजः तमः च अभिभूय सत्त्वम् भवति भारत ।
रजः सत्त्वम् तमः च एव तमः सत्त्वम् रजः तथा ॥)
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भावार्थ :
रजोगुण एवं तमोगुण को दबाकर सतोगुण प्रबल हो उठता है, और रजोगुण भी सतोगुण एवं तमोगुण को दबाकर प्रबल हो उठता है । इसी तरह से तमोगुण भी सतोगुण एवं रजोगुण को दबाकर प्रबल हो उठता है । संक्षेप में एक समय में इनमें से कोई एक सर्वाधिक प्रबल, शेष दो पर हावी हो जाता है ।
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अध्याय 17, श्लोक 1,

अर्जुन उवाच :
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥
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(ये शास्त्रविधिम् उत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषाम् निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वम् आहो रजः तमः ॥)
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भावार्थ :
अर्जुन ने प्रश्न किया -
जो लोग शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट विधि का, (उनसे अनभिज्ञ होने से, या परिस्थितियों के कारण) निर्वाह नहीं कर पाते, किन्तु श्रद्धा से युक्त होते हैं, उनकी निष्ठा को हे कृष्ण! सात्त्विक, राजसिक अथवा तामसिक में से किस श्रेणी में रखा जा सकता है?
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’रजः’ / ’rajaḥ’  - rajoguṇa, distraction, passion,

Chapter 14, śloka 5,

sattvaṃ rajastama iti
guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ |
nibadhnanti mahābāho
dehe dehinamavyayam ||
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(sattvam rajaḥ tamaḥ iti
guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ |
nibadhnanti mahā bāho
dehe dehinam avyayam ||)
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Meaning :
sattva, raja and tama,  these three attributes (guṇa) of manifestation (prakṛti) bind him to the body, to the one (the consciousness associated with the body), who takes himself as the body.
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Chapter 14, śloka 7,

rajo rāgātmakaṃ viddhi
tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam |
tannibadhnāti kaunteya
karmasaṅgena dehinam ||
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(rajaḥ rāgātmakam viddhi
tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam |
tat nibadhnāti kaunteya
karmasaṅgena dehinam ||)
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Meaning :
Know the rajo-guṇa (passion), that is of the nature of identification, is born of desire and longings for pleasures. And the same (rajo-guṇa) binds the embodied being (soul / jīva) with the action (karma) and the hope of the fruits (karmaphala) of that action (karma)
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Chapter 14, śloka 9,

sattvaṃ sukhe sañjayati
rajaḥ karmaṇi bhārata |
jñānamāvṛttya tu tamaḥ
pramāde sañjayatyuta ||
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(sattvam sukhe sañjayati
rajaḥ karmaṇi bhārata |
jñānamāvṛtya tu tamaḥ
pramāde sañjayati uta ||)
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Meaning :
bhArata (arjuna)! Driven by the attribute of harmony (sattvaṃ), the mind ( citta ) gets identified with joy and peace, driven by the attribute of passion (rajaḥ / rajas), the mind gets identified with  action, and driven by the attribute of inertia (tamaḥ / tamas) the mind gets identified with sloth, idleness.
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Chapter 14, śloka 10,

rajastamaścābhibhūya
sattvaṃ bhavati bhārata |
rajaḥ sattvaṃ tamaścaiva
tamaḥ sattvaṃ rajastathā ||
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(rajaḥ tamaḥ ca abhibhūya
sattvam bhavati bhārata |
rajaḥ sattvam tamaḥ ca eva
tamaḥ sattvam rajaḥ tathā ||)
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Meaning : Overpowering rajoguṇa and tamoguṇa, satoguṇa prevails. Overpowering satoguṇa and tamoguṇa, rajoguṇa prevails. Overpowering satoguṇa and rajoguṇa tamoguṇa prevails.
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Chapter 17, śloka 1,

arjuna uvāca :
ye śāstravidhimutsṛjya
yajante śraddhayānvitāḥ |
teṣāṃ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa
sattvamāho rajastamaḥ ||
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(ye śāstravidhim utsṛjya
yajante śraddhayānvitāḥ |
teṣām niṣṭhā tu kā kṛṣṇa
sattvam āho rajaḥ tamaḥ ||)
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Meaning :
arjuna :
What kind of the conviction (niṣṭhā) is of those, who are devoted ( śraddhayānvitāḥ) to the Supreme principle (that maintains this whole existence), but don't quite follow the specific injunctions as are laid down in the scriptures (just because of the circumstances).
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