Thursday, September 25, 2014

9/13,

आज का श्लोक,
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अध्याय 9, श्लोक 13,

महात्मनस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यवयम् ॥
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(महात्मनः तु माम् पार्थ दैवीम् प्रकृतिम् आश्रिताः ।
भजन्ति अनन्यमनसः ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥)
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भावार्थ :
किन्तु  हे पार्थ (अर्जुन)! महात्माजन, जो मेरी दैवी (परा) प्रकृति के आश्रित हैं मुझको सम्पूर्ण भूतों का आदि जानते हुए अनन्यमन से मेरी भक्ति करते हैं ।
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टिप्पणी :
उक्त श्लोक का संबंध इस अध्याय 9 के पहले के दो श्लोकों 10 तथा 11 से है, जिनमें परमात्मा के स्वरूप से अनभिज्ञ रहकर उनकी उपेक्षा करनेवाले, मोहिनी (अपरा) प्रकृति के वशीभूत लोगों का वर्णन किया गया है ।
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Chapter 9, śloka 13,

mahātmanastu māṃ pārtha
daivīṃ prakṛtimāśritāḥ |
bhajantyananyamanaso
jñātvā bhūtādimavyavayam ||
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(mahātmanaḥ tu mām pārtha
daivīm prakṛtim āśritāḥ |
bhajanti ananyamanasaḥ
jñātvā bhūtādimavyayam ||)
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Meaning :
On the other hand, O pārtha (arjuna)! The meritorius souls, who take shelter in MY Superior Manifestation (parā prakṛti / pure consciousness), being aware that I AM The Beginning of all beings, dedicate themselves completely to ME with undivided devotion.      
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