Wednesday, September 17, 2014

4/15,

आज का श्लोक,
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अध्याय 4, श्लोक 15,

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतर कृतम् ॥
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(एवम् ज्ञात्वा कृतम् कर्म पूर्वैः अपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्म एव तस्मात् त्वम्  पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥)
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भावार्थ :
(मुझे कर्म नहीं छूते, और मुझे कर्मफल की स्पृहा (आसक्ति) नहीं है, ... पिछले श्लोक में जैसा कहा गया, उस क्रम में आगे, ...)
इस प्रकार से जानते हुए मुमुक्षुओं द्वारा पूर्वकाल में कर्म किया गया, इसलिए तुम भी पूर्व में और पहले के भी मुमुक्षुओं द्वारा सर्वदा किए गए कर्म को ही करो ।    
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Chapter 4, śloka 15,

evaṃ jñātvā kṛtaṃ karma
pūrvairapi mumukṣubhiḥ |
kuru karmaiva tasmāttvaṃ
pūrvaiḥ pūrvatara kṛtam ||
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(evam jñātvā kṛtam karma
pūrvaiḥ api mumukṣubhiḥ |
kuru karma eva tasmāt tvam
pūrvaiḥ pūrvataraṃ kṛtam ||)
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Meaning :
[In continuation to, as explained in the earlier śloka 14, I never cling to (the sense of performing) the action (karma), nor have attachment with the fruits of the action, ....]
Keeping this in mind, the seekers in the past, eager to attain liberation (mumukṣu) have always let the action (karma) happen through them. Therefore do let the action (karma) happen through you, as was always done by those aspirants in the earlier times.
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